भारतीय दंड संहिता अध्याय 20
आपका स्वागत है हमारे न्यू ब्लॉग पोस्ट आर्टिकल में आज हम बताएंगे कि भारतीय दंड संहिता अध्याय 20 के बारे में।
आज हम बात करेंगे भारतीय दंड संहिता अध्याय 20: न्यायालय की परिभाषा के विषय पर तो चलिए शुुरू करते हे।
परिचय
भारतीय दंड संहिता (IPC) भारत का आपराधिक कानून है। यह कोड 1860 में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित किया गया था और तब से कई बार संशोधित किया गया है। IPC में आपराधिक कृत्यों की परिभाषा और उनके लिए दंड का प्रावधान है।
IPC अध्याय 20 में "न्यायालय" की परिभाषा दी गई है। इस अध्याय में दो धाराएं हैं।
धारा 20: न्यायालय की परिभाषा
IPC की धारा 20 के अनुसार, "न्यायालय" से अभिप्राय कायदेनुसार जिसे न्यायिक कार्य करने का अधिकार है, वह व्यक्ति या न्यायाधीशों का वह मंडल है, जो एकत्र होकर (एक से अधिक) कायदेनुसार न्यायिक कार्य करता है।
व्याख्या
इस धारा के अनुसार, "न्यायालय" की परिभाषा निम्नलिखित है:
• न्यायालय वह व्यक्ति या मंडल हो सकता है जिसे कायदेनुसार न्यायिक कार्य करने का अधिकार है।
• न्यायिक कार्य से अभिप्राय ऐसे कार्य है जो न्यायालय द्वारा किए जाने के लिए निश्चित किए गए हैं।
उदाहरण
• उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय, न्यायिक मजिस्ट्रेट, आदि न्यायालय हैं।
• एक सिविल या आपराधिक मामले की सुनवाई करने वाला न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट भी न्यायालय है।
निष्कर्ष
IPC अध्याय 20 में "न्यायालय" की परिभाषा दी गई है। इस धारा के अनुसार, "न्यायालय" से अभिप्राय कायदेनुसार जिसे न्यायिक कार्य करने का अधिकार है, वह व्यक्ति या न्यायाधीशों का वह मंडल है, जो एकत्र होकर (एक से अधिक) कायदेनुसार न्यायिक कार्य करता है।
तो यह थी हमारी महत्त्वपूर्ण " भारतीय दंड संहिता अध्याय 20" के बारे में जानकारी धन्यवाद 🙏


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